वह अब भी पत्थर तोड़ रही है

कर्मनाशा आज पुरानी डायरी से अपनी एक पुरानी कविता ...वह अब भीइलाहाबाद के पथ परपत्थर तोड़ रही है।और अब भीढेर सारे निराला उस पर कविता लिख रहे हैं।अब भीनहीं उगा है कोई छायादार वृक्षजिसके तलेउसका बैठना किया जा सके स्वीकार।उसके हाथ का गुरु हथौड़ाअब भी प्रहार किए जा रहा... [पूरी पोस्ट]
writer sidheshwer

कविता

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[07 Mar 2010 21:45 PM]

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