नहीं सुन पाए राकेश मूथा की कविता

अनवरत उद्यान में मेरे पास ही बैठे संजय व्यास ने मुझे प्रभावित किया। एक दम सौम्य मूर्ति दिखाई पड़ रहे थे वे। वे पूरी बैठक में कम बोले लेकिन जितना बोले बहुत संजीदा। मैं ने उन्हें अब तक बिलकुल नहीं पढ़ा था। इस कारण उन के लिए बहुत असहज भी था। बाद में जब कोटा आ कर... [पूरी पोस्ट]
writer दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

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[20 Feb 2010 13:48 PM]

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