होली के दिन का फिर हमें है इन्तज़ार
हमारे शायर दोस्त पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ हर साल बड़ी हसरत लिए निकलते हैं होली खेलने। उन की हसरत कई साल से पूरी न हो पा रही है। बस एक वादा लिए लौट आते हैं हर बार। पिछले साल लौटे तो एक नज़्म लिखी। आज होली के दिन उन की ये नज़्म उन्हीं को समर्पित है । इस आशा के...
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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
poetry
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[01 Mar 2010 09:38 AM]



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