अंग अंग जब तक ना भीगे तब तक होगी होल़ी

दर्पण के टुकड़े कभी खेला करते थे होली जिद्द कर के हम सबसे पर जब से हुआ बदरंग ये जीवन छुए नही रंग तबसे यूं तो होली खेलने अब भी साथी घर आते हैं पर जीवन हो बदरंग तो फिर रंग कहाँ कोई भाते हैं तुमने जानू कह कर मेरी जान ये क्या कर डालारंगहीन जीवन में मेरे फिर से रंग भर डाला... [पूरी पोस्ट]
writer Krishan lal "krishan"
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[28 Feb 2010 00:00 AM]

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