जला है यूं घर का मेरे तिनका तिनका

दर्पण के टुकड़े अंधेरो में रहने की आदत है हम को उजालो में आने से डरते बहुत हैं तेरे आने से घर हो सकता था रौशन पर आँखे चोंधियाने से डरते बहुत हैं जिसे भी दिखाए उसी ने कुरेदे जख्मो की अपनी यही दास्ताँ है बेवजह नही जो किसी मेहरबान को जख्म अब दिखाने से डरते बहुत हैं अभी तक... [पूरी पोस्ट]
writer Krishan lal "krishan"
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[06 Mar 2010 02:38 AM]

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