दर्पण के टुकड़े

दर्पण के टुकड़े कौन वो मेरा क्या है तुम ही कुछ मुझ को बतलाओमेरा होकर भी मेरा नहीं क्या लगता है कुछ समझाओहम दूर दूर रहते हैं लेकिन पास पास भी रहते हैंदिल की सारी बाते अक्सर हम इक दूजे से कहते हैंइक दूजे के काँधे पे सर रख साथ साथ हम रोये हैंइक दूजे का हाथ पकड़ अक्सर... [पूरी पोस्ट]
writer Krishan lal "krishan"
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[04 Mar 2010 03:55 AM]

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