नन्हीं कलियाँ (शमा)
जब एक बूँद नूरकी,भोलेसे चेहरे पे किसी,धीरेसे है टपकती ,दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,मुसकाती हैं होटोंकी,वही तो कविता कहलाती!क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?क्यों बाहोंमे झुलाते नही?क्यों देते हैं घोंट गला?करतें हैं गुनाह ऐसा?जो काबिले माफी नही?फाँसी के फँदेके सिवा...
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shama
नहीं कलियाँ
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[06 Mar 2010 03:27 AM]



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