भला मानो होली है

चौखट निवेदन फागुन सेन जाने कब क्या हुआ बचपन हो गया लुप्तयौवन छलके देह से फागुन रखियो गुप्तकुछ छींटे महसूस कर भीगा सारी रात-मौसम हुआ शरारती खबर बांट दी मुफ्तभांग और होलीलगती पीकर भांग को होली बड़ी विचित्रफिर तो भाभी सा लगै देखो अपना मित्रअगर कहीं वो पास नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer पवन *चंदन*

विचित्र मित्र रंग

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[28 Feb 2010 22:27 PM]

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