हाथ कान पर कान कंधे पर कंधा कान के गले मिलता हुआ (अविनाश वाचस्पति)
पढ़ने के बाद हंसें नहीं, हंसना अपने पर ही होगा, समस्या गंभीर है, जरूरत है अमल की, क्या आप बचेंगे, अमल आज से ही शुरू करेंगे हाथ कान परकान कंधे परकंधा कान केगले मिलता हुआउचकता हुआजरा सी भीलापरवाहीबना सकती है अतीतजो है वर्तमान।जान न भी लेअतीत न भी बनाएभंग...
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अविनाश वाचस्पति
कविता
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[04 Mar 2010 18:36 PM]



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