एक चौरस खिड़की...वक़्त की उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है .....

DIL KI  BAT पैर के नीचे तकिये को ठीक करके मैने उचककर उस खिड़की से नीचे झाँकने की कोशिश की है .....एक पतंग कटकर गिरी है ....बड़ी वाली.गिलासटा ..दो मिनट हो गए है कोई लेने नहीं आया ....पिछले दस दिन से वही खिड़की मेरी बाहरी दुनिया है ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ .अनुराग
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[19 Feb 2010 03:08 AM]

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