मुक्तक ३४
दया पे जीना किसी की मुझे गवारा नहींमैं अपने आपमें पर्वत हूँ, जल की धारा नहींअकेली होके भी दुर्बल नहीं रही हूँ मैंतुम्हारा साथ मुझे चाहिए, सहारा नहीं !अलकों से अगर छाए अँधेरे तो क्यानयनों से जो फूटे सवेरे तो क्यासंसार को कुछ प्रेम का रंग भी तो दे देंचुनरी...
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डा.मीना अग्रवाल
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[26 Feb 2010 12:29 PM]



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