मुक्तक 35
समय के हाथ में जीवन का आसरा हम हैंकला की जान हैं, कविता की आत्मा हम हैंइक एक रूप के पीछे हमारे रूप अनेकपरी हैं, देवी हैं, नारी हैं, अप्सरा हम हैं !किसी को हाल जो भीतर का है पता न चलेकिसी को दर्द के एहसास की हवा न लगेदुखों को सहने का ढब जानती हैं...
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डा.मीना अग्रवाल
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[03 Mar 2010 05:27 AM]



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