ओ छोटी कलियों इतनी नासमझी क्यों

parul chaand pukhraaj kaa..... आज बाग़ मे बड़े सबेरेउचक रही नन्ही कलिका कोपूरे खिले,युवा फूल से ज़रा ओट जो सरकायातुरत लचक वह टूट गयीझुक बैठी डाली के बीचगंध,रूप,रंग हीन ओ छोटी कलियोंइतनी नासमझी क्यों ?बीज रूप रोपा था तुमकोअभी समय था,बहुत समय तुम्हे सयानी होने में कल तड़के पूछूँगी फिर मैहाल... [पूरी पोस्ट]
writer पारूल

मेरे फ़ितूर

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[24 Feb 2010 09:29 AM]

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