सुनो यह विलाप -आलोक श्रीवास्तव

दख़ल अवध की एक शाम पुकारती हैलोगो सुनोलहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर बिछा दो तुम जाजमरौशनियांतुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईदउस मातम को छिपा नहीं पाएगीजो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता हैढही... [पूरी पोस्ट]
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kavita

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[02 Mar 2010 01:15 AM]

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