नारीवादी समर्थकों से सवाल है कि उनका मुहं तब क्यों नहीं खुलता, जब खुद नारी ही नारी की शोषक होती है।

हम लोगों की दुनिया नारी समर्थकों और सौंदर्य समर्थकों की नोक-झोंक के बीच में बेनामी महाराज का कूदना, कुछ ऐसा लगा जैसे नारद मुनि देवलोक से उतर आये  हों। पिनका-पिनका कर बहस को आगे बढ़ा रहे थे। सारे दोस्तों ने दामिनी नामक फिल्म जरूर देखी होगी। दामिनी एक महिला रहती है। उसी... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभात गोपाल झा

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[03 Mar 2010 14:41 PM]

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