महिला दिवस पर एक कविता, जो समर्पित है मेधा पाटकर, किरण बेदी और कल्पना चावला जैसे नामों को, नाम जो विद्रोह हैं, महिला बने रहने से विद्रोह के नाम ।
महिला दिवस जुट पड़ी हैं ढेर सारी महिलाऐं सभागार में, आठ मार्च जो है..! लिपिस्टिक से पुते होठों, कांजीवरम की साड़ियों, और इत्र फुलैल का महिला दिवस! मेधा पाटकर तो नहीं लगाती कभी भी लिपिस्टिक..! मेरे ख्याल से लक्ष्मी बाई ने भी नहीं लगाई होगी कभी..! किरण बेदी...
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पंकज सुबीर
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[07 Mar 2010 22:21 PM]



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