काकः काकः, पिकः पिकः
ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी...
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कंचन सिंह चौहान
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[24 Feb 2010 00:52 AM]



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