बेटियाँ होती ही ऐसी हैं

सच को सलाम आज भी वो दिन याद करता हूं खुद पर हँसी आने लगती है। सोचना हूं वो भी क्या दिन थे। मेरी छोटी सी मासूम रिया। बमुश्किल तीन-चार माह की रही होगी। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ जाती। ऐसा लगता कि वो मुझसे कुछ कहना चाहती है। दिल-दिमाग को समझाता, अभी... [पूरी पोस्ट]
writer Manoj Pamar
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[08 Mar 2010 01:50 AM]

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