कविता ही फिलहाल

जो देखा भूलने से पहले पनवाड़ी प्रकाशक हो गए परांठे वाली गली मेंकवि के पान पर चूना लगाकर,अलखनिरंजनकह के कूदी अभिशप्त बरगद से एक छायामेरी जुबान बंद हैमेरे इन्कार में उपस्थित है उसका चेहरा,रजाईयों में दुबकी अभिजात्य आत्माओँ नेबंद कर ली अपनी आँखें अँधेरे से डर कर.©मोहन राणा... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[10 Feb 2010 18:42 PM]

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