बावली धुन

जो देखा भूलने से पहले रात थी सुबह हो गईकरवटों में भी नहीं मिली कोई जगहयह गलत पतों की यात्रा है मेरे दोस्तरास्ता भूलना है तो साथ हो लो,शर्त यही कि भूलना होगा अपना नाम पहले,वैसे डर किसे नहीं लगता लोगों के भूल जाने कायाद दिलाते रहें जनम जनमों तकउन्हें अपनी अनुपस्थिति कीकब होगी... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[12 Feb 2010 09:03 AM]

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