शोक सभा में

जो देखा भूलने से पहले बुदबुदाते शब्द झर कर गिर जाते हैं अदृश्य धूल के कणों की तरहचर्च के ठंडे फर्श परप्रार्थना के शब्दशोक के शब्दस्मृति के शब्दअनुपस्थिति को उकेरते शब्दविस्मृति की स्याही मेंएकांत के शब्दइस बार बसंत भी भूल गया जल्दी आना.क्या मैं फुसफुसा दूँ कुछ तुम्हारे कानों... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[20 Feb 2010 17:53 PM]

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