ऊबा हुआ उत्साह
ऊबे हुए उत्साह से बैठा हुआ इंसान ताकता है अपने लेख की ओर, मोहित होता है खुद ही और फिर खुद ही हँस देता है अचकचा कर शर्मा कर। ठहर ठहर के बढती उम्र अटक जाती है अचानक कहीं, जैसे अटक जाता हो कंप्यूटर धूल और वक्त खाकर। आलमारी पर पड़ी किताबें कभी कभी एक उदास...
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विकास कुमार
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[03 Mar 2010 11:24 AM]



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