शाही स्नान: मुक्ति घाट पर
शायद इन्सानी फितरत है. हर इन्सान मुक्ति चाहता है. हर इन्सान शांति चाहता है और इसी तलाश में और अधिक उलझता चला जाता है. क्या हमें सही मार्ग ज्ञात नहीं? हो सकता है कि सही मार्गदर्शक न मिल पाता हो. अव्वल तो हम ठीक ठीक परिभाषित ही नहीं कर पाते कि हम चाहते...
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Udan Tashtari
कविता
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[14 Feb 2010 22:17 PM]



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