"संगिनी"

कुछ मेरी कलम से -kuch  meri kalam se ** यूं जब अपनी पलके उठा केतुम देखती हो मेरी तरफ़मैं जानता हूँ....कि तुम्हारी आँखेपढ़ रही होती हैमेरे उस अंतर्मन कोजो मेरा ही अनदेखामेरा ही अनकहा है..अपनी मुस्कराहट सेजो देती हो मेरे सन्नाटे कोहर पल नया अर्थऔर मन की गहरी वादियों मेंचुपके से खिला देती होआशा से... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]
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[06 Mar 2010 03:57 AM]

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