चिरैया
फुनगी पर बैठी थी चिड़िया,लपकी थी नभ की ओरचुराई थी सांझ की लाल डिबियाउड़ाई थी, फुटकायी थीबनी थी गुलाबी गुलाल चिरैया।ले के सांझ के संदेसेलौटी थी अपने नीड़पातियों को किया कंठबद्धस्वर दिया, संगीत दिया बनी थी काली कोयल गौरयाभोर के पास पहुँचाने थे संदेसेतड़के उठ...
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रजनी भार्गव
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[10 Feb 2010 13:00 PM]



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