रोशनी की लकीरें
कुछ दूर रख करकुछ फ़ासले से देखाकागज़ पर उतरते नक्श कोधरती पर उतरती सूरज की छायाजैसे बदलती हर पहर के रूपगाढ़े रंग, हल्के रंगआढ़ी, तिरछी रोशनी की लकीरेंसब उतर गए थे छवि के संगउन के बीच में थीवोउदास आँखें जोबीन रहीं थीबसंत में खिलेरोशनी से भरेसफ़ेद चेरी के...
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रजनी भार्गव
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[17 Feb 2010 07:48 AM]



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