अँधेरे में अकेले

प्रत्यक्षा एक बगीचा था । धूप से भरा । एक कमरा भी था जिसकी दीवारें नहीं थीं । बगीचे की नीली छत थी । कमरे में हरियाली थी । औरत सोचती थी यही जन्नत है , भीतर बाहर । ऐसा सोच कर उसे बेतरह खुशी मिलती थी । और इतना कहते ही एक अकेली चिड़िया आसमान में एक तीखे उड़ान में निकल... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[14 Feb 2010 09:55 AM]

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