कुसुम कुमारी कुँज बेहारी

प्रत्यक्षा सपने के भीतर एक और सपना था , पानी पर तैरती मरी मछली के पेट जैसा , पीला फीका और निस्तेज़ । ऐसा नहीं था कि जागी दुनिया कुछ शोख चटक थी लेकिन सपनों से एक दूसरे उड़ान की कल्पना और उम्मीद तो रखी ही जा सकती थी । शहरज़ाद की हज़ार कहानियों वाली अरेबियन टेल्स की तरह... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[19 Feb 2010 00:23 AM]

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