रात के बाद

प्रत्यक्षा निर्मल कुहनी पर सर टिकाये दीवार का कोना देखती है । गर्मी है उमस है अँधेरा है। साड़ी का पल्ला फर्श पर फैला है जैसे नदी बहती हो , अँधेरी रात में नीली नदी , शरीर बहता है मन बहता है । कमर पर पसीने की झुलस झाँस है । फिर भी दिल में कैसी हुमस है , ऐसे इस तरह लेट... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[25 Feb 2010 03:29 AM]

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