छत मिलेगी ? और सपना ?

प्रत्यक्षा बाहर सन्न हवायें डोलती हैं , उँगलियों पर दिन निकलते हैं , रात ? रात भर बात चलती है ,सपनों की दुनिया दिन के उजाले की खैरात पर नहीं चलती , सफेद पँखों वाले घोड़े की पीठ पर बेखट सरपट बहती हवा के संग किसी और छोर निकल जाती हैं अँधेरी रात में बाँसुरी की धुन चाँद... [पूरी पोस्ट]
writer Pratyaksha
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[27 Feb 2010 21:01 PM]

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