चंद मुक्तक
ना पूछो, वक्त ने क्या क्या सितम ढहाए हैं। अपनो ने जो रास्ते हमको अब तक दिखाए हैं समझ आता नही जाए कहां कोई बता दो यार, यहां हर मोड़ पर हमने देखे बस चौराहे हैं। ************************************ हरिक चौराहे पर अब भीड़ दिखती है। वह ऐसा मुझे हर खत मे लिखती...
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परमजीत बाली
परमजीत बाली
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[28 Feb 2010 20:05 PM]



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