सुन्न शिखर का मुसाफिर
वहां अब शब्द नहीं हैंध्वनियां हैं फकत...और भागती हुई तस्वीरेंकुछ धुंधले अर्थों के गिर्द मंडराती हुईखिंचे चेहरे और ऐंठी जीभ से निकलाएक सवाल मुझ तक पहुंचता हैआप क्या वीर है?वीर? कौन? अजी मैं कहां?एक मुस्कान धूमिल जर्द चेहरे पर दिखती हैनिराशा से भरी हुई,...
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चंद्रभूषण
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[18 Feb 2010 08:54 AM]



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