बिकाऊ शहर में हर ओर अब बाज़ार बाक़ी हैं

हिन्द-युग्म सभी सपने नहीं टूटे अभी दो चार बाकी हैं कहो अश्कों से आँखों में अभी अंगार बाकी हैंखुदाया ये तेरी दुनिया में इतना फर्क सा क्यों है कहीं पर भूख बाकी है कहीं ज़रदार बाकी हैंखरीदारी बची है या बचे हैं बेचने वाले बिकाऊ शहर में हर ओर अब बाज़ार बाक़ी हैंअभी भी... [पूरी पोस्ट]
writer नियंत्रक । Admin

ravindra sharma ravi

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[16 Feb 2010 00:30 AM]

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