परदेशियों की होली
परदेशियों की होली है न हँसी है, न ठिठोली है जैसे बंजर में घास नहीं उगती है यहाँ रंग की फुहार नहीं चलती है रंग बिना होली बेरंग होती है बिना चीनी की चाय फीकी होती है बिना हुड़दंग के यह कैसी होली है जैसे बिन भंग की ठंडाई घोली है जो सभ्यता से खेली वह कैसी...
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Laxmi N. Gupta
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[25 Feb 2010 16:10 PM]



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