फाल्गुन आया रे !
गोरी को बहकाने फाल्गुन आया रे । रंगों के गुब्बारे फूट रहे तन आँगन, हाथ रचे मेंहदी के याद आते साजन ॥ प्रेम-रस बरसाने फाल्गुन आया रे । यौवन की पिचकारी चंचल सा मन, नयनों से रंग कलश छलकाता तन ॥ तन-मन को भरमाने फाल्गुन आया रे । [] राकेश 'सोहम' dhanyavad...
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राकेश 'सोहम'
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[19 Feb 2010 03:08 AM]



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