मेरी जिंदगी में किताबें
कुछ दिन हुए किताबों के महामेले से लौटी हूं। पुस्तक मेले में जाना मेरे लिए किसी उत्सव की तरह होता है, हालांकि जानती हूं कि वहां से मनों निराशा और टनों उदासी के साथ वापस लौटूंगी। हिंदी किताबों का संसार हजार-हजार फांस बनकर आंखों में चुभता रहता है। छुटपन...
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मनीषा पांडे
किताबें
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[13 Feb 2010 05:44 AM]



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