एक बेचैन पत्नी का आत्म विलाप
जब से सुहासिनी आई है, आभा बेचैन रसोई से कमरे और कमरे से रसोई में फिरकी सी डोल रही है। रसोई में होती है तो भी कान लगाए रहती है कि आशु इसे गुपचुप क्या पढ़ा रहा है। कहीं मेरे बारे में तो बात नहीं कर रहे हैं। सब्जी काटते, दाल छौंकते, चावल बीनते उसके कान इधर...
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मनीषा पांडे
स्त्री मन के भीतर
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[21 Feb 2010 03:43 AM]



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