ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!
सीमा आजाद और विनायक सेन जैसी नजीरों के इस दौर में बाबा नागार्जुन की यह कविता उनके नाम जो चुप्पियों और चाटुकारिता को सीने से लगाए घूम रहे हैं.सच न बोलना नागार्जुनमलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!जंगल में...
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Reyaz-ul-haque
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[03 Mar 2010 08:49 AM]



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