जो हैं वाहे तुम्हारे होंगेम

गीतकार की कलम जो दर्पण से बिछुड़ गये हैंवे प्रतिबिम्ब हमारे होंगेसपनों से जुड़ सके नहीं तोद्रवित नयन के तारे होंगें संघर्षों की खिली धूप मेंपांव तले खोती परछाईंतपी आग की छाया पीतीचेहरे पर छाई अरुणाईखुली उंगलियां पकड़ न पातींआशा की चादर के कोनेचाहत रहती बन कर रानीकिसी... [पूरी पोस्ट]
writer Geetkaar
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[14 Feb 2010 20:55 PM]

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