मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
तुमने जो सम्बोधन देकर मुझे पुकारा खंजननयननेबस उस के ही सन्दर्भों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तकफ़िसला हुआ अधर की कोरों से, चढ़ कर स्वर की लहरी परथाम हवाओं के झोंके की उंगलियाँ जो मुझ तक आयामन में उमड़ रहे भावों की ओढ़े रंग भरी दोशालाजिसे सांझ की परछाईं ने काजल...
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राकेश खंडेलवाल
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[14 Feb 2010 20:58 PM]



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