जो कहानी लिखी थी गई रात भर
थी धुंधलके मे रजनी नहाये हुएचांदनी चांद से गिर के मुरझाई सीआंख मलती हुई तारकों की किरणले रही टूटती एक अँगड़ाई सीकक्ष का बुझ रहा दीप लिखता रहासांझ से जो शुरू थी कहानी हुईलड़खड़ाते कदम से चले जा रहीलटकी दीवार पर की घड़ी की सुईफ़र्श पर थी बिछी फूल की...
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राकेश खंडेलवाल
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[21 Feb 2010 21:04 PM]



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