चाँदनी की धुली हर किरन पी गये
धूप की डोरियों से बन्धे थे प्रहरथीं घड़ी की सुई डगमगाती रहींबन बिखरती रही आज की झोंपड़ीआस तिनके पे तिनका सजाती रहीकल जो आया ढला आज में, खो गयाफिर प्रतीक्षा संवरने लगी इक नईदांये से बांये को, बांये से दांये कोमथ रही ज़िन्दगी, इक समय की रईजो बिखर कर गिरा भोर...
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राकेश खंडेलवाल
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[23 Feb 2010 20:39 PM]



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