क्षणिकायें - गम और खुशी
उम्र भर संभाले कांच से रिश्ते
बस और किया क्या है
सुलझाते रहे वेतरतीब उलझने
जीने को जिया क्या है ++++++++++++++++++++++++++++ सोचो भला क्या होगी
हमारे दर्द की दास्तां
दो घडी सुनके जिसे
हर अजनबी
जी भर कर रोया ++++++++++++++++++++++++++++ गुजरे हादसे अभी...
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मोहिन्दर कुमार
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[11 Feb 2010 01:57 AM]



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