चांद जब मुस्करा रहा था

दिल का दर्पण -  परावर्तन वही झोंकेवही बदली फ़र्क सिर्फ़ इतना भर तुम नहीं हो साथ मेरे अकेलापन खा रहा था वही बांसुरी वही धुन फ़र्क सिर्फ़ इतना भर वह गीत लगा अपना सा दूर जो कोई गा रहा था वही रुत वही रात फ़र्क सिर्फ़ इतना भर हम बहा रहे थे आंसू चांद जब मुस्करा रहा था... [पूरी पोस्ट]
writer मोहिन्दर कुमार
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[16 Feb 2010 05:00 AM]

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