होली है भई होली है. खेलने वाली नहीं , गाने वाली
शाम हुई और मन हुरियारा हो गया.फागुन की हवा में ही कुछ ऐसी मस्ती होती है कि मन करता है कुछ रंगीन्, कुछ चुलबुली शरारत ,कुछ छेडछाड़ की जायेकिसी की चुनरी भिगोई जायेकिसी को चिकोटी काटी जाये.किसी से चुहल की जाये.और कुछ नहीं तो बस मस्ती में अकेले ही झूम लिया...
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अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi
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[01 Mar 2010 07:59 AM]



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