मेरी ‘सच्ची-सच्ची’ भाभी

एकोऽहम् ईश्वर सब सुख एक साथ कभी नहीं देता। इसे चाहें तो ‘कोई न कोई कसर रख ही देता है’ कह दें या फिर यह कि वह किश्त-किश्त में सुख देता है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ-तीन रात और लगभग सवा दो दिनों तक सुख सागर में गोते लगाने के बाद भी एक सुख की कसर रह गई।बरसों बाद... [पूरी पोस्ट]
writer विष्णु बैरागी

मेरे आसपास के औलिया

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[12 Feb 2010 06:10 AM]

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