यूँ ना मिल मुझसे कि ख़फा हो जैसे...
यूँ ना मिल मुझसे,कि ख़फा हो जैसे,चल ना यूँ साथ मेरे,आसमाँ मे बस एक घटा हो जैसे,एक अन्जान मुसाफिर सी जाने कब बन गई तू,तेरी बातें भी यूँ लगती है कि कोई एहसान हो जैसे,तेरी मौजूदगी नहीं, साथ चाहिए मुझे तेरा,अभी तो लगता है कि हवाओं से बातें हो रही हो...
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Gurnam Singh Sodhi
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[11 Feb 2010 04:49 AM]



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