बन बैठा इंसान दरिंदा (सामाजिक संकट )

काव्य तरंग बन बैठा इंसान दरिंदा, तौबा इसकी बुरी नज़र ।कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।नर्क बना रहे जीवन इनका, इज्जत को इनकी छीन कर ।ये भी माँ, बहन, किसी कि बेटी है, खुद अपने घर में डाल नज़र ।।ना भरोसा आस पड़ोस का, ना बचा यकीन किसी रिश्तेदार... [पूरी पोस्ट]
writer RaniVishal

बलात्कार

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[09 Feb 2010 18:51 PM]

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