हुंकार
दायरे ऐसे भी बनते हैं कि फिर मिटते नहीं,लुट जाती हैं हस्तियाँ, कारवां मिटते नहीं.जितना चाहे रौन्दलो या चाहे कितना तोड़लो,हौसले फौलादों के आग से जलते नहीं.रात के हों घुप्प अँधेरे या हों कई साये घनेरे,रौशनी कि एक किरण के सामने डटते नहीं.चाहे मीलों हो गगन...
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●๋• नीर ஐ
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[09 Feb 2010 11:07 AM]



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