हरी आँख का समंदर

Kuchh kahi kuchh unkahi (वर्ष १९८८,मई की तपती धूप और उनकी याद..बस खींच दी कागज पे चाँद लकीरें और लिख दी दिल की बात यूँ एक कविता के रूप में जो आपके लिए नीचे प्रस्तुत है।) सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ - तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है, दिन भर की थकान हवा में गुम हो जाती... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[09 Feb 2010 10:49 AM]